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क्षेत्रीय आहार से दवाई के लिए सुलभ होती औषधीय केवाँच

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केवाँच जिसे किवाँच या कौंच के नाम से भी जाना जाता है आज कल चर्चा में है। भारत सरकार द्वारा औषधीय पौधों की खेती को बल दिया जा रहा है। ऐसी खेती को बढ़ावा देने के लिए केन्द्र सरकार ने राष्ट्रीय आयुष मिशन की ओर से अनुदान की व्यवस्था की है। औषधीय पौधों की सूची में जिसके लिए अनुदान की व्यवस्था है केवाँच भी शामिल है। जाहिर है इसकी खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है।

केवाँच- औषधि भी आहार भी

उपलब्ध जानकारियों के आधार पर आयुर्वेद में औषधि के रूप में इसका विस्तृत वर्णन है। पारम्परिक चिकित्सा एवं उपचार पद्धति में इसका उपयोग काफी प्राचीन है। अनेकानेक बीमारियों की दवाइयों में इसके उपयोग की एक लम्बी सूची है। मुख्य रूप से इसकी जड़, पत्ती, बीज, रोम का औषधि के रूप में उपयोग का वर्णन है। फली के भी कुछ औषधीय गुण बताए गए हैं। फलियाँ पोषण की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। विभिन्न शोध में भी ऐसा पाया गया है। दवाइयों के लिए विभिन्न औषधीय तत्वों का आसान उपलब्ध विकल्प माना जा रहा है इसे।

गाँव-घरों में लम्बे समय से इसका सब्जी के रूप में उपयोग होता आ रहा है। इसकी हरी फली, हरे/पके/सूखे बीज और सूखे बीज के आटे का उपयोग कई व्यंजन में होता है। सब्जी के लिए उन हरी फलियों का चयन किया जाता है जिसमें बीज पूरी तरह से तैयार हो चुके हों। इस तरह आहार में इसका बीज एक प्रमुख अंग है।

औषधि के रूप में इस्तेमाल होने की वजह से बीज बाज़ारों में ज्यादा उपलब्ध है। हरी फलियाँ भी सब्जी के लिए यदा-कदा बाज़ारों में दिख जाती हैं। बीज का पाउडर भी बाजार में उपलब्ध है।

पोषक और औषधीय तत्वों से भरपूर है केवाँच। इसे कुपोषण से निपटने और पूरक आहार के आसानी से उपलब्ध विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। इसके अलावा इसकी कोमल पत्तियाँ भी कुछ जगह आहार में उपयोग होती हैं। केवाँच में खाद्य पदार्थ और औषधीय गुणों के रूप में बहुत कुछ है जानने के लिए…

देसी-छोटे स्तर पर उपज वाली सब्जी

लम्बे समय से केवाँच गाँव-घरों में भोजन का हिस्सा रही है। बहुत से क्षेत्रों में आज भी इसका सेवन किया जाता है। आहार में इसका उपयोग बहुत व्यापक स्तर पर नहीं रहा है। यह क्षेत्र या समुदाय विशेष के ही आहार का हिस्सा रही है। एक प्रमुख फसल की तरह इसकी खेती नहीं हुई। ज़्यादातर घर के बागीचे में ही इसे उगाया जाता रहा है। इस वजह से यह छोटे स्तर पर उपज वाली (Minor Crop) श्रेणी में आती है। खाद्य पदार्थों में देसी पर छोटे स्तर पर उपज वाली सब्जी (Indigenous and Minor Vegetables) की सूची में है केवाँच।

Indigenous and Minor Vegetables को खाद्य और पोषण सुरक्षा के लिए आवश्यक स्रोत के रूप में तेजी से पहचाना जा रहा है। भूख और कुपोषण को कम करने में इन अविश्वसनीय सब्जियों की क्षमता को जानने और समझने पर ज़ोर दिया जा रहा है।

केवाँच के भाषाई नाम

बोयी जाने वाली केवाँच का वानस्पतिक नाम Mucuna Pruriens है। अलग क्षेत्रों में इसके कई प्रकार पाये जाते हैं। मोटे तौर पर इसे सफ़ेद और काले बीज वाली, दो प्रकार में बाँटा गया है।

इसे Velvet Bean, Cowhage, Cowitch, Cowage, Mucuna, Lacuna Bean, Buffalo Bean, Nescafe नाम से भी जानते हैं। देश और क्षेत्र के आधार पर इसे कई अन्य नाम से भी जाना जाता है।

कुछ भारतीय क्षेत्रीय भाषाओं में इसके नाम हैं-

बंगाली (Bengali) – Alkushi, Alkusa
पंजाबी (Punjabi) – Kavanch, Kawanchi, Gugli
गुजराती (Gujrati) – Kivanch
तमिल (Tamil) – Punaikkali, Poonaikkate
तेलगु (Telugu) – Pilliadagu, Dulagondi
मराठी (Marathi) – Kuhili
कन्नड़ (Kannad) – Nasugunni
मलयालम (Malyalam) – Nayikuruma, Shoriyanam
कोंकणी (Konkani) – Khavalyavali, Majram

भोजन में उपयोग

सेम की बेल की तरह पनपने वाली केवाँच की हरी फली की सब्जी बनाई जाती है। भिन्न मसालों में इसकी सूखी या रसेदार सब्जी बहुप्रचलित व्यंजन है। हरी फलियों का अचार भी बनता है। बीजों को उबाल कर भी खाया जाता है।

देश-विदेश में इसके पके बीज, आटा, और सत्तू (भुने बीज का आटा) का विभिन्न व्यंजन में उपयोग का जिक्र मिलता है। दलिया, कॉफी का विकल्प, खीर, हलुआ और सूप में इसका उपयोग हो रहा है। इसके आटे को अन्य के साथ मिलाकर भी कई व्यंजन बनाए जा रहे हैं। रोटी के आटे में और बिस्किट के मिश्रण में इसे मिलाकर पौष्टिकता बढ़ाई जा रही है। इसमें सीमित और निश्चित मात्रा में ही इसका उपयोग किया जाता है। केवाँच के बीज और उसके आटे का सीमित मात्रा में ही उपयोग अच्छा माना गया है।

ज्यादा सेवन से हो सकती है परेशानी

केवाँच में पाये जाने वाले कुछ तत्व ज्यादा मात्रा में सेहत के लिए नुकसानदेह हो सकते हैं। कुछ तत्व पोषक तत्वों के शरीर में अवशोषण में बाधा डालने वाले हैं। इनकी उपस्थिति में ज्यादा मात्रा में केवाँच का सेवन हानिकारक हो सकता है।

सेवन से पहले इन तत्वों के इस प्रभाव को खत्म करना जरूरी होता है। इसके लिए इन तत्वों को निकालने या उनकी मात्रा कम करने की कई विधियाँ हैं।

पकाने के लिए विशेष विधियाँ

विशेष विधियों के अंतर्गत ही केवाँच का व्यंजन में उपयोग की सलाह दी गयी है। पारम्परिक तौर पर भी उन विधियों का प्रचलन है। फलियों को उबालकर उस पानी को फेंक देना प्रस्तावित विधियों में से एक है। इसके बाद इन उबली फलियों का सब्जी में उपयोग होता है।

बीज को उबालकर पानी हटा देना, कई पानी बदलकर भिगोना, भूनना, अच्छे से पकाना प्रमुख हैं। परम्परागत रूप से भी ऐसी ही कई विधियाँ अपनाकर ही इसका भोजन में उपयोग किया जाता है।

फलियों से हो सकती है असहनीय खुजली

भारत में इसकी कई प्रजातियाँ पायी जाती हैं। प्राप्त जानकारियों में लगभग 15 प्रजातियों का वर्णन मिलता है। विश्व स्तर पर इसकी 100 से अधिक प्रजातियाँ पायी जाती हैं। प्राप्त जानकारी में लगभग 130 प्रजातियों का वर्णन मिलता है।

आम जानकारी में केवाँच के जंगली और बोयी जाने वाली दो प्रकार जाने जाते हैं। जंगली में फलियों पर रोएँ ज्यादा और लम्बे होते हैं। इनके रोये के त्वचा के सम्पर्क में आने से तेज खुजली, जलन, सूजन और दाने हो जाते हैं। बोयी जाने वाली केवाँच में ये प्रभाव नहीं पाया जाता है। इसमें रोये भी कम और छोटे होते हैं।

पोषक तत्वों से भरपूर

केवाँच के बीज प्रोटीन का अच्छा स्रोत हैं। ये मिनेरल्स का भी अच्छा स्रोत हैं। इसमें कैल्शियम, आयरन, ज़िंक, सोडियम, पोटैशियम, फॉस्फोरस, मैग्निशियम, कॉपर और मैगनीज़ की उपस्थिति प्रमुख है। यह आवश्यक वसीय अम्ल (फैटी एसिड्स/fatty acids) का भी अच्छा स्रोत है। इसमे विटामिन सी और बी वर्ग के थायमीन, राइबोफ्लाविन, नियासिन, भी पाये जाते हैं। ऊर्जा मूल्य में यह प्रोटीन के अन्य वानस्पतिक स्रोत (दालें, बीज) के समतुल्य है।

हरी फलियाँ फाइबर, लिपिड, विटामिन, मिनरल, प्रोटीन और एंटीऑक्सीडेंट तत्वों से युक्त हैं। इसमे विटामिन ए, सी की अच्छी मात्रा है। आयरन, कैल्शियम, भी अच्छी मात्रा में होते हैं। सोडियम, पोटैशियम, फॉस्फोरस, सल्फर भी इसमें पाया जाता है। फली और बीज दोनों ही एंटिऑक्सीडेंट तत्वों और फाइबर से भरपूर है।

खाद्य एवं पोषण सुरक्षा

पोषक तत्वों से भरपूर केवाँच को प्रोटीन ऊर्जा कुपोषण से निपटने में उपयोगी माना जा रहा है। पोषण की जरूरतों को पूरा करने के लिए इसे पूरक आहार का एक अच्छा विकल्प माना जा रहा है। खाद्य एवं पोषण सुरक्षा प्राप्ति के उपायों में इसके उपयोग को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसे फूड-सप्लीमेंट, फर्मास्यूटिकल क्षेत्र के लिए आसानी से उपलब्ध हो सकने वाले प्रोटीन और एंटिऑक्सीडेंट के अच्छे स्रोत के रूप में भी देखा जा रहा है।

स्वास्थ्य और सेहत के सम्बंध में

बीज और फली पोषक तत्वों की उपस्थिति से सेहत के कई गुण लिए हैं। ये विभिन्न फ्लेवेनोइड्स, एल्कलॉइड, फेनोलिक्स, पॉलीफेनोल्स, करेटिनोइड्स, एंथोसाइनिन आदि तत्वों से युक्त हैं। अनेक फाइटोकेमिकल्स हैं इनमें। ये एंटीऑक्सीडेंट गुणों से युक्त हैं। बीज एल्कलॉइड एल-डोपा का महत्वपूर्ण स्रोत है। एल-डोपा पर्किंसन्स रोग, तंत्रिका-स्नायु विकार के इलाज में उपयोग होता है। एल-डोपा और पोषक तत्वों की उपस्थिति इसे तंत्रिका सुरक्षा और इसकी सुचारु क्रियाशीलता में उपयोगी होने का विशेष गुण प्रदान करती है। कुल तत्वों की उपस्थिति इन्हें अनेक औषधीय गुण प्रदान करती है।

विभिन्न शोध से प्राप्त जानकारियों द्वारा कुछ स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं पर इनके प्रभाव की संभावनाएँ…

फलियाँ कृमिनाशक, कैंसर-रोधी, शोथ-रोधी, पीड़ानाशक गुणों से युक्त है। जोड़ों और कमर के दर्द कम करने के गुण वाली है। यह मांसपेशियों की अकड़न से सुरक्षा प्रदान करने वाली है। पेट के कीड़ों से निजात दिलाने में प्रभावी मानी गयी है। ज्वर-रोधी या ज्वर की तीव्रता कम करने में सहायक है। कब्ज के इलाज में सहयोगी है। आयरन की पूर्ति करने वाली है। एनीमिया की रोकथाम और इलाज में सहयोगी है।

शुगर के बढ़े स्तर को कम करने का गुण रखती है। पेशाब को बढ़ाने वाली है और वॉटर रेटेंशन की समस्या से निपटने योग्य है। अर्थेराइटिस और गठिया के इलाज में सहयोगी मानी गयी है। टी.बी. और पर्किंसन्स के प्रभाव को बढ्ने से रोकने वाले गुणों से युक्त है। बीज इन गुणों के साथ कई अन्य बीमारियों से लड़ने की क्षमता रखता है।

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पर्किंसन्स रोग से बचाव

केवाँच के बीज में तंत्रिकाओं को सुरक्षा प्रदान करने वाले तत्व पाये जाते हैं। यह अच्छा नर्व टॉनिक है। इसमें मानसिक तनाव को कम कर सकने वाले तत्व पाये जाते है। बीज में पर्किंसन्स रोग से बचाव और सुधार के गुण पाये जाते हैं। पर्किंसन्स तंत्रिका तंत्र से जुड़ा रोग है। इसमें हाथों में कम्पन, शरीर में अकड़न, अंगों का धीमा काम करना, शरीर का संतुलन बिगड़ जाना जैसे लक्षण होते हैं।

मधुमेह-रोधी

केवाँच मधुमेह (Diabetes) के रोगी के लिए फायदेमंद पाया गया है। इसमें रक्त में शुगर के स्तर को नियंत्रित करने का गुण पाया जाता है। शोध में यह रक्त में शुगर के बढ़े स्तर को कम करने में प्रभावी पाया गया है।

अवसाद-रोधी

बीज का सेवन तनाव को दूर करने और खुशी देने वाले हॉरमोन को बढ़ाने में सहायक पाया गया है। यह अवसाद को दूर रखने या नियंत्रण पाने में सहायक पाया गया है। मानसिक स्वस्थ्य को सुदृड़ रखने में सहायक है। घबराहट, बेचैनी पर नियंत्रण रखने में सहायक है। इसे यादश्त खोने (Amnesia) और मानसिक विक्षिप्तिता (Dementia) के इलाज में सहायक माना गया है। यह अच्छी नींद लाने में भी प्रभावी पाया गया है।

कैंसर पर करे वार

केवाँच में ट्यूमररोधी गुण पाये गए हैं। यह कैंसर के प्रभाव को कम करने में सहयोगी पाया गया है। कोशिकाओं को क्षति से बचाने की क्षमता रखता है। यह ट्यूमर की घटाने, कैंसर कोशिकाओं को कम करने में प्रभावी पाया गया है।

पुरुष यौन, प्रजनन संबंधी (Fertility) समस्या में लाभकारी

केवाँच के बीज कामोद्दीपक माने गए हैं। इनमें कामशक्ति बढ़ाने का गुण पाया जाता है। इसमें टेस्टोस्टेरोन (Testosterone) होर्मोन के स्तर को बढ़ाने की क्षमता पायी जाती है। पुरुषों में शुक्राणुओं को बढ़ाने वाला माना गया है। लिंग का टेढ़ापन (Erectile Dysfunction) की समस्या में सुधार करने में सहायक है। यौन शक्ति को बढ़ाने की क्षमता रखता है।

बढ़ती उम्र के असर में कमी

इसका सेवन शरीर में होर्मोन्स के स्तर में संतुलन बनाए रखने में सहायक माना गया है। यह एंटीऑक्सीडेंट का भी अच्छा स्रोत है। इससे बढ़ती उम्र के प्रभावों पर नियंत्रण में सहायता मिलती है।

ऑस्टियोपोरोसिस से बचाव

केवाँच के बीज में कैल्शियम और फॉस्फोरस की अच्छी मात्रा होती है। इसमे ज़िंक, पोटैशियम, मैग्निशियम कॉपर और मैगनीज़ भी पाये जाते हैं। फली में भी कैल्शियम की अच्छी मात्रा होती है। ये हड्डियों को मजबूती देने में महत्वपूर्ण हैं। बीज का सेवन ऑस्टियोपोरोसिस से बचाव में सहायक है। ऑस्टियोपोरोसिस में हड्डियों का घनत्व कम हो जाता है। हड्डियाँ लचीली और कमजोर हो जाती है। जिससे फ्रैक्चर का खतरा बढ़ जाता है।

यकृत (Liver) सुरक्षा

केवाँच एंटीऑक्सीडेंट का अच्छा स्रोत है। यह यकृत (Liver), पित्ताशय (Gallbladder) से हानिकारक फ्री रेडिकल निकालने की क्षमता रखता है। इसमें SGPT, SGOT, ALP और बिलिरूबिन के बढ़े स्तर को कम करने का गुण है। यह यकृत को सुरक्षा प्रदान कर इसकी क्रियाशीलता को नियमित रखने में उपयोगी है।

वजन नियंत्रण

केवाँच का सेवन वजन नियंत्रित करने में सहायक माना गया है। इसमें भूख को नियंत्रित करने और वसा के स्तर को नियंत्रित रखने का गुण पाया जाता है।

गुर्दे की पथरी बनने में कमी

केवाँच में पेशाब बढ़ाने (Diuretic) का गुण पाया जाता है। यह गुर्दे (Kidney) द्वारा शरीर से विषैले तत्व निकालने में सहायक है। गुर्दे में लवण के जमने को रोकने में सहायक होकर पथरी बनने की आशंका कम करने वाला है।

हृदय धमनी रोग से सुरक्षा

बीज में एथरोस्क्लेरोसिस से बचाव के गुण पाये जाते हैं। केवाँच में शरीर में अच्छे कोलेस्टेरॉल को बढ़ाने, और बुरे कोलेस्टेरॉल को कम करने की क्षमता है। इसमे उच्च रक्तचाप को कम करने और रक्तचाप नियंत्रित कर सकने का गुण भी है।

यूटीआई की कम संभावना

केवाँच के बीज में जीवाणु-रोधी (Antibacterial) गुण पाया जाता है। ग्राम पॉज़िटिव और नेगेटिव कई जीवाणुओं पर यह प्रभावी है। यह मूत्र नली संक्रमण (UTI) के कारक जीवाणु के विरुद्ध प्रभावी है। यह यूटीआई होने की आशंका में कमी लाने में सहायक है। इसमें कई अन्य संक्रमण कारक जीवाणुओं से लड़ने की क्षमता है। जीवाणु जनित श्वसन नली, त्वचा, भर्ती मरीजों में होने वाले संक्रमण पर नियंत्रण में महत्वपूर्ण है। पेट दर्द, दस्त, उल्टी के कारक जीवाणुओं के विरुद्ध भी असरदार है।

अस्थमा पर प्रभाव

केवाँच शोथ-रोधी और एंटीऑक्सीडेंट गुणों से युक्त है। इसमें विभिन्न एलेर्जी से लड़ने (Antihistaminic) की क्षमता है। यह कफ़नाशक (Antitussive) है। इसमें अस्थमा के नियंत्रण में सहायक होने का गुण है।

इम्यूनिटी दुरुस्त

केवाँच के बीज इम्यूनोमॉड्यूलेटरी हैं। इसमे रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) की क्रियाशीलता को नियंत्रित रखने का गुण है। फलियाँ भी विटामिन सी और एंटीऑक्सीडेंट गुण के कारण इम्यूनिटी को मजबूती देने वाली हैं।

अर्थराइटिस

केवाँच शोथ-रोधी, पीड़ानाशक और एंटीऑक्सीडेंट गुणों से युक्त है। यह अर्थराइटिस की जटिलताओं पर नियंत्रण में सहयोग देने वाला है।

ध्यान दें-

  • केवाँच को प्रस्तावित विधियाँ अपनाकर ही पकाकर खाना चाहिए। इसके उपयोग में आवश्यक पाक विधि का पूरा ज्ञान जरूरी है।
  • सही विधि या सही से नहीं पकी केवाँच सेहत के लिए नुकसानदेह/ स्वास्थ्य समस्याएँ हो सकती है। बीजों को पाचन और सेहत के अनुरूप बनाने के लिए शोधन जरूरी है।
  • ज्यादा सेवन से कुछ लोगों को पेट फूलना, उल्टी, मिचली, सिर-दर्द जैसी समस्यायें हो सकती हैं।
  • किसी भी रोग की अवस्था में विशेषज्ञ से व्यक्तिगत सलाह के आधार पर ही इसका सेवन करें।
  • मधुमेह के रोगी दवा के साथ इसके सेवन में सावधानी बरतें। दवा के साथ इसका सेवन शुगर के स्तर को सामान्य से कम (लो ब्लड शुगर/low blood sugar) कर सकता है। यह सेहत के लिए नुकसानदेह है।
  • मानसिक या तंत्रिका तंत्र की बीमारियों की दवाओं के साथ इसके सेवन में सावधानी जरूरी है। विशेषज्ञ से व्यक्तिगत सलाह के आधार पर ही इसका सेवन करें।
  • गर्भवती स्त्रियाँ और स्तनपान कराने वाली माताएँ इसके सेवन से बचें।
विशेष- इस लेख का उद्देश्य चर्चा और जानकारी मात्र है। किसी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले या सेवन शुरू करने से पहले विशेषज्ञ से व्यक्तिगत परामर्श आवश्यक है। आहार में एकदम से बदलाव या जीवन शैली में परिवर्तन पर विशेषज्ञ से व्यक्तिगत परामर्श आवश्यक है।

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